भूमिका
हम इस सृष्टि के अंग है और इसके नियम हम सब पर लागू होते हैं | सृष्टि में जो भी बदलाव हमें देखने को मिलते हैं या महसूस करते हैं उसके अनुसार हमारे शरीर में भी बाहरी और अंदरूनी बदलाव होते हैं |इन बदलावों के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए हमें खान पान और रहन सहन में भी परिवर्तन करना उचित रहता है |आयुर्वेद ही हमें प्रकृति के साथ तालमेल का सही तरीका सिखाता है और इसके बारे में ज्ञान प्राप्त कर हम अपने स्वास्थ्य का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं |
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी ,समय की कमी और विशेष रूप से अज्ञानता के कारण हमारा प्रकृति के साथ तालमेल बिगड़ गया है जिसके कारण हम अनेक तरह के स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्याओं से ग्रसित रहते हैं |छोटी से छोटी समस्या भी अगर लम्बे समय तक बनी रहे तो बड़ी समस्या में बदल जाती है | दिल ,गुर्दा ,थायरोइड ,हड्डी ,मानस ,कर्क रोग इत्यादि की बीमारियाँ एक दिन में तो होती नहीं है ,इनका बीज तो बहुत पहले ही पड़ जाता है पता हमें तब चलता है जब पेड़ फलदार हो जाता है लेकिन तब तक समय निकल चुका होता है |
सृष्टि में हर चीज एक व्यवस्था के अनुसार कार्य करती है |इसमें हमेशा परिवर्तन होते रहते हैं लेकिन ये परिवर्तन भी एक निश्चित सिस्टम /प्रणाली के अनुसार होते हैं | परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है जिसकी वजह से ये अपने आप को संतुलित बनाये रखती है | हम देखते हैं की ऋतुएं बदलती रहती हैं ,जलवायु बदलता है ,सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक भी कई तरह के मौसमी बदलाव होते हैं |
जब प्रकृति में बदलाव होता है तो यहाँ पायी जाने वाली हर वस्तु पर इसका असर पड़ता है |हम भी इसी प्रकृति का हिस्सा हैं और हमारे ऊपर भी इस बदलाव का सीधा प्रभाव पड़ता है |अगर हम इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाकर नहीं चलते हैं तब हमें परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है |स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए हमें सृष्टि /प्रकृति में होने वाले परिवर्तन ,उसमें घटने वाली घटनाओं और उनके प्रभाव को समझना बहुत जरुरी है | हमें संतुलन में बने रहने के लिए अपने आहार विहार में बदलाव करके स्वयं को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना पड़ता है |
दैनिक परिवर्तन
आयुर्वेद में प्रकृति में होने वाले परिवर्तन और उसके कारण हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या की गयी है और स्वास्थ्य को संतुलन में रखने के उपाय भी बताये गए हैं |
इसी कड़ी में यहाँ हम दैनिक रूप से होने वाले परिवर्तनों की चर्चा कर रहे हैं –
आयुर्वेद के अनुसार हम जानते हैं की हमारा शरीर वात ,पित्त और कफ इन तीन दोषों या धातुओं से बना होता है |दिन भर में 4-4 घंटे का इनका समय चक्र निर्धारित है |सुबह 6 बजे से 10 बजे तक का समय कफ का ,10 बजे सुबह से 2 बजे दिन तक का समय पित्त का और 2 बजे दिन से शाम 6 बजे तक का समय वात का होता है |उसी तरह यही चक्र शाम 6 बजे से सुबह के 6 बजे तक चलता है |
जब हम सुबह सोकर उठते हैं तो हमारा शरीर हमें भारी प्रतीत होता है ,दोपहर में सुबह से थोड़ा हल्का और शाम में सबसे हल्का प्रतीत होता है |ऐसा कफ ,पित्त और वात के कारण होता है क्योकि जब जिसका समय चलता है वह उस समय प्रबल होता है और उसका गुण दोष उस समय प्रभाव में रहता है | जब हम इसकी तुलना करेंगे तो ये पता चलेगा की कफ सबसे भारी ,पित्त थोड़ा हल्का और वात सबसे हल्का होता है |
दिनचर्या
स्वयं को स्वस्थ और संतुलित रखने के लिए हमें दिनचर्या का पालन करना चाहिए |आयुर्वेद के अनुसार जो हमारी दिनचर्या निर्धारित की गयी है वह इस प्रकार की गयी है जिससे ये दोष संतुलन में रहते हैं |जब हमारी दिनचर्या इसके अनुसार नहीं होती है तब इन दोषों के बिगड़ने की सम्भावना बनती है |जब एक दोष बिगड़ता है तो वह दुसरे दोषों को भी बिगाड़ता है और फिर जब ऐसे ही चलता रहे तो कुछ समय के बाद बीमारी आना तय है |अतः हमें दिनचर्या पे ध्यान देना जरुरी है क्योकि यह स्वस्थ रहने की दिशा में उठाया गया पहला कदम होता है |
आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार सुबह का नाश्ता हल्का ,दिन का खाना भरपेट/भारी और शाम का खाना कम खाना चाहिए |इस बात को आज विज्ञान भी मानता है और इसकी चर्चा हम आगे करेंगे |
सुबह 6 बजे से 10 बजे तक(कफ का समय )

इस समय मौसम सबसे ठंडा रहता है और जैसे जैसे दिन चढ़ता जाता है ,ठंडापन कम होता जाता है और गर्मी में बढ़ोतरी होती है |इस समय कफ का प्रकोप रहता है अतः हमें कफ को शांत करने वाला आहार विहार करना चाहिए |कफ की प्रबलता के समय हमें :-
- —1शरीर भारी और सुस्त मालूम होता है क्योंकि कफ का एक गुण है भारीपन |
- — पाचन धीमा रहता है क्योंकि कफ का एक गुण है ठंडापन|
इसलिए हमें नाश्ते में वैसी चीजें शामिल नहीं करनी चाहिए जिनकी तासीर ठंढी हो,पचने में भारी हो क्योकि ऐसी स्थिति में कफ और बनेगा जिससे शरीर और भारी होगा ,सुस्ती बढ़ेगी और आलस्य या नींद आने की सम्भावना बढ़ जाएगी और हमारा काम बाधित होने लगेगा क्योंकि ये समय होता है हमारे नौकरी या काम पर जाने का |इसलिए सुबह का नाश्ता हल्का या सुपाच्य होना चाहिए |
सुबह 10 बजे से दिन के 2 बजे तक(पित्त का समय )

इस समय सूर्य की प्रखरता बढ़ने से वातावरण में गर्मी बढ़ जाती है , कफ की प्रबलता कम हो जाती है और पित्त प्रबल हो जाता है जिससे पाचन शक्ति अर्थात जठराग्नि सबसे तेज होती है और भारी या गरिष्ठ भोजन भी आसानी से पच जाता है |इसलिए इस समय पौष्टिक और संतुलित भोजन किया जाना चाहिए ताकि शरीर को पूरा पोषण मिल सके |
अगर इस समय अंतराल में भारी भोजन नहीं किया जाये तो पित्त बढ़ा होने की वजह से शरीर में गर्मी बढ़ेगी और पाचन अग्नि का भी पूरा उपयोग नहीं हो पायेगा |इससे खाना जल्दी पच जायेगा और फिर से भूख लग जाएगी (अक्सर हममें से कईयों ने ये महसूस किया होगा की 2-3 बजे के लगभग कमजोरी या सुस्ती जैसी लगती है |इसे विज्ञान की भाषा में 3 pm blues कहा जाता है ) |इस कारण से शाम में खाने की मात्रा ज्यादा हो सकती है जो और ज्यादा नुकसानदेह हो जायेगा |किसी विशेष परिस्थिति में ही हल्का भोजन करना ठीक रहता है |
दिन के 2 बजे से शाम के 6 बजे तक(वात का समय )

इस समय वात प्रबल रहता है |वात सबसे हल्का होता है इसलिए शरीर भी सबसे हल्का महसूस करता है |मौसम में भी बदलाव होता है ,हवाएं चलने लगती हैं ,पित्त के समय जो गर्मी बढ़ी हुयी थी वह धीरे धीरे कम होने लगती है | रूखापन ,हल्कापन ,चंचलता और ठंढापन ये सब वात के गुण होते हैं |इसका प्रभाव दिखने लगता है |
शाम के समय हम खुद को ज्यादा चंचल महसूस करते हैं |इस समय हमें चटपटा और तली भुनी चीजें खाने की इच्छा होती है |ये सब वात बढ़ा होने की वजह से होता है क्योंकि तैलीय ,गरम और भारी खाद्य पदार्थ वात को कम करते हैं |
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आज विज्ञान भी ये बात मानता है की हमारे शरीर का सिस्टम बाहरी वातावरण के अनुसार चलता है जिसे हम जैविक घड़ी या CIRCADIAN CLOCK के नाम से जानते हैं | इस घड़ी के अनुसार हमारे अन्दर की जैविक प्रक्रियाएं चलती हैं जैसे सोना ,जागना ,भूख लगना ,हॉर्मोन का निकलना (कब कौन सा हॉर्मोन का उत्पादन करना है ) इत्यादि |इस घड़ी में 24 घंटे का चक्र चलता है यानि की यह 24 घंटे में खुद को दोहराती है और तब इसे CIRCADIAN CYCLE या CIRCADIAN RHYTHM कहा जाता है |अगर इस चक्र में कोई भी व्यवधान हुआ तो सिस्टम या शरीर की कार्य प्रणाली बिगड़ जाती है और तब बीमारी की शुरुआत होती है |किसी अन्य ब्लॉग में इसकी विस्तृत चर्चा की जाएगी |
ध्यान रखने योग्य बातें
- अगर दोष बिगड़े हुए हों तो सबसे पहले दोष को संतुलित किया जाता है क्योकि उस परिस्थिति में सही आहार भी दोषों को विकृत कर सकता है |
- अगर कोई एक दोष बिगड़ा हुआ है तो वह दुसरे दोषों को भी बिगाड़ देता है |
- अगर दोष बिगड़े हुए हों तो प्राकृतिक परिवर्तन के अनुसार शारीरिक परिवर्तन नहीं हो पाता है |
- दोष अगर प्रकोपित हैं तो जिस तरह प्रकृति स्वयं को संतुलित कर पाती है उस तरह हमारा स्वास्थ्य संतुलित नहीं हो पाता है |
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